तुर्कमानपुर, गोरखपुर
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी

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परिचय एवम् उद्देश्य

प्राचीन काल से प्रसिद्ध परम पूज्य बाबा गोरखनाथ जी की नगरी में छोटे-बड़े अनेक शिक्षणसंस्थान शिशुओं के विकास हेतु शिक्षा देने के लिए प्रयत्नशील हैं | पद्धतियाँ अपने में श्रेष्ठ होती है, पद्धतियाँ चाहे देशी हों या विदेशी आवश्यकता इस बात की है कि हम कितनी निष्ठा से काम करते हैं और शिक्षण संस्थान में शिक्षा प्राप्त कर रहे बालक-बालिकाओ का विकास किस अनुपात में हो रहा है|

आज भारत का प्रत्येक नागरिक यह अनुभव करता है की हमारी संतान प्राचीन भारतीय संस्कारों को ग्रहण करे, जिससे वह अपनी श्रेष्ठ परम्पराओं एवम् मान्यताओं, अपनी मिट्टी, अपने देवी-देवताओं तथा महापुरुषों का आदर्श अपनाकर, अपने तथा अपने पूर्वज़ों के सम्मान तथा देश समाज की रक्षा एवम् सेवा करने में समर्थ हो सकें | इस सन्दर्भ में हमें यह स्मरण रखना होगा कि बच्चों का पालन पोषण एवम् शिक्षा दीक्षा किस सिद्धांत को आधार मानकर किया जा रहा है | क्योंकि हम जानते हैं की धरती पर जिस प्रकार का बीज़ारोपण होगा वैसा ही फल हमें प्राप्त होगा, इसलिए प्रत्येक अभिभावकों को चाहिए की अपनी आकांक्षा एवम् उद्देश्य को ध्यान में रखकर ही सामाजिक परिवेश एवम् शिक्षण संस्थान का चयन करें जिससे आगामी संतति एक संस्कारक्षम नागरिक बन सके | इन्ही आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भारतीय संस्कार शिक्षा मंदिर, तुर्कमानपुर की स्थापना 7 जुलाई 1985 को किया गया|

हमारा लक्ष्य इस प्रकार की शिक्षा प्रणाली का विकास करना है जिससे गिरते हुए मानवीय जीवन मूल्यों एवम् नैतिक मूल्यों की पुन: प्रतिष्ठा हो सके | हम इस शिक्षा प्रणाली के द्वारा ऐसी युवा शक्ति का निर्माण करना चाहते हैं, जो चरित्रवान्, संस्कार वान , संस्कृतिनिष्ठा एवम् राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत हों, शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक एवम् आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण विकसित हों और जो वर्तमान चुनौतियों का सामना मुस्कुराते हुए सफलतापूर्वक कर सके और जो कुरीतियों, शोषण और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर सकें तथा राष्ट्रीय जीवन को सुसंपन एवम् सुसंस्कृत बनाने के लिए समर्पित हो सके |